राहगीरों से मुलाक़ात

राहगीरों  से मुलाक़ात 


रुकी हुई आवाज़ों से कहती हूँ ये बात 
कुछ राहगीरों से हुई मुलाक़ात
कुछ अपने, कुछ पराये, कुछ अपनेपन का चोला ओढ़े हुए 
ऐसे कुछ राहगीरों से हुई मुलाक़ात।
सब सुनते, सब कहते,
सबके अलग अंदाज़, सबके अलग अल्फ़ाज़, 
समझाने  के सबके अपने अपने अदब दिखे 
पर पीठ-पीछे खुद उलझनों से लिपटे हुए,
शान भी है, मान भी है, 
बेचैन दिल भी है और दिमाग भी है,
ऐसे ही कुछ राहगीरों से हुई मुलाक़ात। 
कुछ दोस्त बने, कुछ दोस्त से ज़्यादा करीब हुए,
कोई दिमाग में आया, कोई दिल में उतरा,
पर सबके भीतर एक दूसरा इंसान कहीं छिपा हुआ 
ऐसे ही कुछ राहगीरों से हुई मुलाक़ात 
रुकी हुई आवाज़ों से कहती हूँ कुछ बात 
कई राहगीरों से हुई मुलाक़ात।     

Maa

   माँ 

माँ हँसती है तो पूरा घर हँसता है, 
माँ रोती है तो पूरा घर मायूस हो जाता है, 
माँ हमें लोरी सुनाती है, माँ हमें गोद में सुलाती है,
तो फिर हमें माँ की छोटी सी बात क्यों बुरी लग जाती है? 
माँ अपने हाथों से खिलाती है, अपने सीने से लगाती है,
तो फिर माँ ही क्यों दूर कर दी जाती है? 
माँ नहलाती है, सजाती है, सँवारती है,
तो फिर हर घर में माँ क्यों नहीं सँवारी जाती है?
माँ की सारी  खुशियाँ हमसे है, 
तो फिर हमारी सारी खुशियाँ माँ क्यों नहीं बन जाती है?
माँ हमें देख मुस्काती है, माँ हमें देख खिल जाती है,
तो फिर हम माँ को क्यों नहीं समझ पाते हैं?
माँ को तक़दीर लिखने का हक़ होता तो आज सारी खुशियाँ हमारी होती,
ये कोई कहावत नहीं सच्चाई है, माँ के दिल की गहराई है,
हम तो प्यारे माँ के ,
तो हमें सबसे प्यारी हमारी माँ क्यों नहीं बन जाती है?
 

कितना मुश्किल होता है।

कितना मुश्किल होता है हंसना, जब हंसी न आए कितना मुश्किल होता है रोना, जब आंसू सूख जाए जीना भी हो और जी भी न पाएं मरना न हो फिर भी मरे सा एहस...